अरावली पर्वत श्रृंखला केवल पहाड़ों का समूह नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत की पारिस्थितिकी का एक मौन प्रहरी है। लगभग 650 किलोमीटर में फैली यह श्रृंखला दिल्ली से लेकर गुजरात तक फैली हुई है और दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रंखलाओं में से एक मानी जाती है। अरबों वर्ष पुरानी यह पहाड़ी व्यवस्था आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अरावली की परिभाषा को केवल “100 मीटर ऊँचाई” तक सीमित करने का निर्णय लिया गया, जिसने पर्यावरणविदों, नागरिकों और विशेषज्ञों के बीच गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
यह निर्णय तकनीकी रूप से सरल लग सकता है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम अत्यंत गंभीर हैं। अरावली केवल ऊँचाई का विषय नहीं है; इसकी असली पहचान उसकी जैव विविधता, जल संरक्षण, जलवायु संतुलन और मरुस्थलीकरण को रोकने की क्षमता में निहित है। जब किसी प्राकृतिक संरचना को केवल मापदंडों और आंकड़ों में सीमित कर दिया जाता है, तब उसका समग्र महत्व अनदेखा हो जाता है। यह लेख उसी न्यायिक दृष्टिकोण, उसके प्रभावों और उससे उत्पन्न पर्यावरणीय असंवेदनशीलता पर विस्तार से चर्चा करता है।
बिंदु 1: अरावली की पारिस्थितिक और ऐतिहासिक महत्ता
अरावली पर्वत श्रृंखला भारत की पारिस्थितिकी में एक रीढ़ की हड्डी की तरह कार्य करती है। यह पश्चिमी राजस्थान में थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने में सहायक है और उत्तर भारत में भूजल पुनर्भरण, वर्षा संतुलन तथा तापमान नियंत्रण में अहम भूमिका निभाती है। यही नहीं, अरावली अनेक दुर्लभ वनस्पतियों और जीव-जंतुओं का घर है, जिनमें रेगिस्तानी, प्रायद्वीपीय और ओरिएंटल जैव तत्वों का अनोखा मिश्रण देखने को मिलता है।
इतिहासकारों और भूवैज्ञानिकों के अनुसार, अरावली लगभग 3.2 अरब वर्ष पुरानी है। इसकी धीमी लेकिन स्थिर उपस्थिति ने सदियों से मानव सभ्यताओं को संरक्षण दिया है। दिल्ली रिज, जो अरावली का उत्तरी विस्तार है, आज भी राजधानी को प्रदूषण और धूल भरी आंधियों से आंशिक सुरक्षा प्रदान करता है।
जब हम अरावली को केवल ऊँचाई के पैमाने से आंकते हैं, तो हम उसकी इस समग्र भूमिका को नकार देते हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से पहाड़ का महत्व उसकी ऊँचाई नहीं, बल्कि उसका भूवैज्ञानिक फैलाव, ढाल, वनस्पति और जलधारण क्षमता तय करती है।
बिंदु 2: न्यायिक हस्तक्षेप और परिभाषा का संकट
1990 के दशक के अंत में सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली क्षेत्र में अवैध खनन पर रोक लगाकर एक ऐतिहासिक पहल की थी। यह हस्तक्षेप पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक मजबूत कदम माना गया। लेकिन समय के साथ यह प्रक्रिया धीरे-धीरे तकनीकी बहसों में उलझती चली गई।
राजस्थान सरकार द्वारा प्रस्तुत “डीम्ड डेफिनिशन”, जिसमें केवल 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले हिस्सों को अरावली माना गया, मूल रूप से खनन गतिविधियों को आसान बनाने के लिए तैयार की गई थी। प्रारंभ में न्यायालय ने इस परिभाषा को अस्वीकार कर दिया था और वन सर्वेक्षण संस्थान को व्यापक अध्ययन का निर्देश दिया था।
हालाँकि, 2025 में दिए गए अंतिम निर्णय में उसी ऊँचाई आधारित परिभाषा को स्वीकार कर लिया गया। यह निर्णय बिना यह स्पष्ट किए लिया गया कि इससे कितने पहाड़ी क्षेत्र अरावली की परिभाषा से बाहर हो जाएंगे। इस तरह न्यायिक प्रक्रिया ने संरक्षण के बजाय वर्गीकरण को प्राथमिकता दी, जो अपने आप में एक गंभीर विरोधाभास है।
बिंदु 3: ऊँचाई आधारित परिभाषा के पर्यावरणीय परिणाम
100 मीटर ऊँचाई की शर्त अपनाने का सबसे बड़ा खतरा यह है कि अरावली के विशाल भूभाग को कानूनी संरक्षण से बाहर कर दिया गया है। इससे उन क्षेत्रों में खनन, निर्माण और औद्योगिक गतिविधियाँ तेज़ी से बढ़ सकती हैं, जो अब तक प्राकृतिक अवरोध के कारण सुरक्षित थे।
अरावली की कई पहाड़ियाँ कम ऊँचाई की हैं, लेकिन वे जलधारण, मिट्टी संरक्षण और स्थानीय जलवायु के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। यदि इन्हें खनन के लिए खोल दिया गया, तो इसका सीधा असर भूजल स्तर, कृषि, वन्यजीव और स्थानीय समुदायों पर पड़ेगा।
इसके अतिरिक्त, पर्यावरण मंत्रालय की 1992 की अधिसूचना, जिसमें कुछ अरावली क्षेत्रों को संवेदनशील घोषित किया गया था, इस नई परिभाषा के साथ अप्रभावी हो जाती है। यह स्थिति विकास और संरक्षण के बीच संतुलन को पूरी तरह विकास के पक्ष में झुका देती है, जो दीर्घकाल में विनाशकारी सिद्ध हो सकती है।
बिंदु 4: जनभागीदारी की कमी और न्यायिक प्रक्रिया
इस पूरे निर्णय-प्रक्रिया में सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि आम नागरिकों, पर्यावरण संगठनों और प्रभावित समुदायों को अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिला। समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई, और अंतिम सुनवाई कुछ ही घंटों में सीमित पक्षों की मौजूदगी में पूरी कर ली गई।
जनहित याचिकाओं का मूल उद्देश्य ही यह था कि समाज के वे वर्ग, जिनकी आवाज़ अन्यथा अनसुनी रह जाती है, उन्हें मंच मिल सके। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में निर्णय कुछ गिने-चुने अधिकारियों और न्यायिक प्रतिनिधियों तक सीमित हो गई है।
जब प्रकृति से जुड़े फैसले बिना व्यापक सार्वजनिक विमर्श के लिए जाते हैं, तो वे न केवल अविश्वास पैदा करते हैं, बल्कि भविष्य में बड़े पर्यावरणीय संकटों की नींव भी रखते हैं। लोकतंत्र में पारदर्शिता और सहभागिता उतनी ही आवश्यक है जितनी न्यायिक विशेषज्ञता।
निष्कर्ष
अरावली पर्वत श्रृंखला की परिभाषा को केवल ऊँचाई तक सीमित करना एक गंभीर नीतिगत और नैतिक भूल है। यह निर्णय अल्पकालिक आर्थिक लाभ को दीर्घकालिक पर्यावरणीय सुरक्षा पर प्राथमिकता देता है। प्रकृति को तकनीकी मानकों में बांधना आसान हो सकता है, लेकिन इसके परिणाम मानव समाज को ही भुगतने पड़ते हैं—चाहे वह जल संकट हो, बाढ़, सूखा या जैव विविधता का नुकसान।
आज आवश्यकता है कि अरावली को उसके संपूर्ण पारिस्थितिक, भूवैज्ञानिक और सांस्कृतिक संदर्भ में समझा जाए। न्यायपालिका, सरकार और समाज—तीनों को मिलकर यह स्वीकार करना होगा कि प्रकृति की रक्षा केवल कानून से नहीं, बल्कि संवेदनशील दृष्टिकोण से होती है। यदि समय रहते इस परिभाषा पर पुनर्विचार नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी।

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